आस्था का अटूट बंधन: नवलगढ़ के बाबा रामदेव मंदिर में 500 वर्षों से चली आ रही अनूठी परंपरा
नवलगढ़ के 500 साल पुराने बाबा रामदेव मंदिर में घोड़े द्वारा धोक लगाने की अनूठी परंपरा और लक्खी मेले की कहानी। जानिए इस आस्था और इतिहास के संगम को।

आस्था का अटूट बंधन: नवलगढ़ के बाबा रामदेव मंदिर में 500 वर्षों से चली आ रही अनूठी परंपरा 🐴
राजस्थान की धरती, वीरता और भक्ति की कहानियों से भरी हुई है। यहाँ कण-कण में इतिहास बसता है और हर पत्थर एक कहानी कहता है। ऐसा ही एक अनूठा स्थान है नवलगढ़ का बाबा रामदेव मंदिर। यह मंदिर सिर्फ एक पूजा स्थल नहीं है, बल्कि यह सदियों से चली आ रही आस्था और परंपरा का जीवंत उदाहरण है। यहां हर साल लगने वाला लक्खी मेला लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचता है, लेकिन इस मेले की शुरुआत एक अनोखी परंपरा से होती है – घोड़े द्वारा धोक लगाने की परंपरा।
एक अद्भुत शुरुआत: घोड़े की धोक और लक्खी मेला 🎨
नवलगढ़ के रामदेवजी मंदिर में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की दशमी को लक्खी मेला शुरू होता है। लेकिन इस मेले की शुरुआत से पहले, एक विशेष रस्म निभाई जाती है। मंदिर में सबसे पहले घोड़ा धोक लगाता है, और उसके बाद ही मेले की शुरुआत होती है। यह परंपरा न केवल अनोखी है, बल्कि यह इस मंदिर के इतिहास और महत्व को भी दर्शाती है।
लीलण की समाधि और राजपरिवार की श्रद्धा
रामदेवजी महाराज के घोड़े, लीलण, की समाधि इस मंदिर में स्थित है। हर साल, नवलगढ़ के राज परिवार का एक घोड़ा रूप निवास पैलेस से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी तय करके मंदिर आता है। घोड़े के साथ सेवक सफेद ध्वज लेकर चलते हैं, जिसे मंदिर के शिखर पर लगाया जाता है। यह परंपरा लगभग 249 वर्षों से चली आ रही है।
🎨 "यह सिर्फ एक रस्म नहीं है, यह हमारे पूर्वजों की आस्था और विश्वास का प्रतीक है," राजपरिवार के एक सदस्य ने बताया। "यह घोड़ा, लीलण की स्मृति का प्रतीक है, जिसने बाबा रामदेवजी की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया।"
इतिहास के पन्ने: उदावती कंवर की प्रार्थना और चमत्कार
इस परंपरा की शुरुआत का इतिहास 18वीं शताब्दी से जुड़ा हुआ है। नवलगढ़ राजघराने के रिकॉर्ड के अनुसार, सन् 1774 में दिल्ली सल्तनत के आदेश पर मिर्जा राजा नजफकुली ने तत्कालीन जागीरदार नवलसिंह शेखावत सहित पंचपाना के जागीरदारों को धोखे से नजरबंद कर दिया था।
उस समय, नवलसिंह की पत्नी उदावती कंवर ने बाबा रामदेवजी से अपने पति के सुरक्षित लौटने की प्रार्थना की। मान्यता है कि उसी वक्त रामदेवजी का घोड़ा नवलसिंह के पास पहुंचा। नवलगढ़ की दक्षिण दिशा में स्थित जोहड़ में आकर जब नवलसिंह घोड़े से उतरे, तो उन्हें रामदेवजी के दर्शन हुए।
इसके बाद, उदावती देवी सन् 1775 में घोड़े के साथ रूप निवास पैलेस से रामदेवजी मंदिर में धोक लगाने आई थीं। तब से यह परंपरा लगातार चली आ रही है। यह कहानी न केवल उदावती कंवर की अटूट श्रद्धा को दर्शाती है, बल्कि यह बाबा रामदेवजी की कृपा और चमत्कार का भी प्रमाण है।
लक्खी मेले का महत्व: आस्था का सागर
लक्खी मेला नवलगढ़ और आसपास के क्षेत्रों के लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है। यह मेला बाबा रामदेवजी के प्रति उनकी गहरी आस्था और श्रद्धा का प्रतीक है। मेले के दौरान, लाखों श्रद्धालु बाबा रामसा पीर के मंदिर में धोक लगाते हैं और अपनी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
मेले में उमड़ती भीड़: एक अद्भुत दृश्य
मेले में हर साल 5 से 7 लाख श्रद्धालु आते हैं। यह दृश्य अपने आप में अद्भुत होता है। दूर-दूर से लोग पैदल चलकर आते हैं, भजन गाते हैं और बाबा रामदेवजी के नाम का जाप करते हैं। मेले में विभिन्न प्रकार की दुकानें और स्टॉल लगते हैं, जहाँ लोग अपनी जरूरत की चीजें खरीदते हैं। यह मेला न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक रूप से भी महत्वपूर्ण है।
मेले में भक्ति और मनोरंजन का संगम
लक्खी मेले में भक्ति और मनोरंजन का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। एक तरफ, लोग बाबा रामदेवजी की भक्ति में लीन रहते हैं, वहीं दूसरी तरफ, वे मेले में विभिन्न प्रकार के मनोरंजन का भी आनंद लेते हैं। मेले में झूले, सर्कस और अन्य प्रकार के मनोरंजन के साधन उपलब्ध होते हैं। यह मेला हर उम्र के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र होता है।
नवलगढ़: इतिहास और संस्कृति का संगम
नवलगढ़ न केवल बाबा रामदेव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह अपनी ऐतिहासिक इमारतों और सांस्कृतिक विरासत के लिए भी जाना जाता है। यहां कई खूबसूरत हवेलियां और मंदिर हैं, जो राजस्थानी वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण हैं। नवलगढ़ की गलियों में घूमना एक अद्भुत अनुभव है। यहां हर पत्थर में इतिहास की गूंज सुनाई देती है।
पर्यटन का केंद्र: नवलगढ़ की खोज
नवलगढ़ धीरे-धीरे एक महत्वपूर्ण पर्यटन केंद्र के रूप में उभर रहा है। यहां आने वाले पर्यटक न केवल बाबा रामदेव मंदिर के दर्शन करते हैं, बल्कि वे नवलगढ़ की ऐतिहासिक इमारतों और सांस्कृतिक विरासत को भी देखते हैं। नवलगढ़ राजस्थान की संस्कृति और इतिहास को जानने के लिए एक शानदार जगह है।
भविष्य की राह: परंपरा को जीवित रखना
नवलगढ़ के लोग इस अनूठी परंपरा को जीवित रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। वे यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं कि यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक जारी रहे। यह परंपरा न केवल नवलगढ़ की पहचान है, बल्कि यह राजस्थान की संस्कृति और इतिहास का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- युवा पीढ़ी को शिक्षित करना: नवलगढ़ के लोग युवा पीढ़ी को इस परंपरा के महत्व के बारे में शिक्षित कर रहे हैं। वे उन्हें इस परंपरा के इतिहास और अर्थ के बारे में बता रहे हैं।
- मेले का आयोजन: नवलगढ़ के लोग हर साल लक्खी मेले का आयोजन करते हैं। वे यह सुनिश्चित करते हैं कि यह मेला सुरक्षित और सुचारू रूप से आयोजित किया जाए।
- मंदिर का रखरखाव: नवलगढ़ के लोग बाबा रामदेव मंदिर का रखरखाव करते हैं। वे यह सुनिश्चित करते हैं कि मंदिर हमेशा साफ और सुंदर रहे।
🎨 "यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस परंपरा को जीवित रखें," एक स्थानीय निवासी ने कहा। "यह परंपरा हमारी पहचान है, और हम इसे किसी भी कीमत पर नहीं खोना चाहते।"
निष्कर्ष: आस्था की शक्ति
नवलगढ़ के बाबा रामदेव मंदिर में घोड़े द्वारा धोक लगाने की परंपरा आस्था की शक्ति का प्रतीक है। यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि आस्था में कितनी ताकत होती है। यह हमें यह भी सिखाती है कि हमें अपनी परंपराओं और संस्कृति को हमेशा जीवित रखना चाहिए।
अंत में, मैं यही कहना चाहूंगा कि नवलगढ़ एक अद्भुत जगह है। यहां आने वाले हर व्यक्ति को आस्था, इतिहास और संस्कृति का एक अनूठा अनुभव मिलता है।
"आस्था हो तो पत्थर में भी भगवान दिखते हैं!"